Recently On TheGita.net:

Chapter – 12

Chapter 1|| Chapter 2 || Chapter 3 || Chapter 4|| Chapter 5 || Chapter 6 || Chapter 7 || Chapter 8 || Chapter 9 || Chapter 10 || Chapter 11 || Chapter 12 || Chapter 13 || Chapter 14 || Chapter 15 || Chapter 16 || Chapter 17 || Chapter 18 ||

Shrimad Bhagwad Gita – Chapter – 12 (Complete)

Chapter – 12 – Shloka -1

Bhagwad Geeta 12-01- TheGita.net

 

Arjuna asked:
Those devotees who worship you as the one without attributes (formless) and those who worship you as the one with attributes (with form); which of these are better versed in Yoga?

अर्जुन बोले ——-जो अनन्य प्रेमी भक्त्त जन पुर्वोक्त्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्मा को ही अति श्रेष्ट भाव से भजते हैं ——उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं ? ।। १ ।।

Chapter – 12 – Shloka -2

 

Bhagwad Geeta 12-02- TheGita.net

The Blessed Lord said:
Those who have fixed their minds on Me and worship me with total dedication and faith, them I consider perfect in Yoga.

श्रीभगवान् बोले —–मुझ में मन को एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन ध्यान में लगे हुए* जो भक्त्त जन अतिशय श्रेष्ट श्रद्बा से युक्त्त होकर मुझ सगुण रूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं ।। २ ।।

Chapter – 12 – Shloka -3, 4

 

Bhagwad Geeta 12-03-04- TheGita.net

But those who worship the formless, the Indefinable, the Imperishable, the Unmanifest, the Omnipresent, the Unthinkable, the Unchangeable, the Immovable, the External-
Having controlled all of the senses, always evenminded, thinking of the welfare of all beings, they also come to Me.

परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन बुद्भि से परे, सर्वव्यापी अकथनीय स्वरूप और सदा एक रस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार’ अविनाशी, सच्चिदानन्दधन ब्रह्मा को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सब में समान भाव वाले योगी मुझको ही प्राप्त होते है ।। ३ – ४ ।।

Chapter – 12 – Shloka -5

 

Bhagwad Geeta 12-05- TheGita.net

However, the worship of God without form is very difficult for the embodied because it is very hard to set the mind on the unmanifest, i.e. the one not capable of being recognized with the aid of the senses.

उन सच्चिदानन्दधन निराकार ब्रह्मा में आसक्त्त चित्त वाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है ; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त्त विषयक गति दुःख पूर्वक प्राप्त की जाती हैं  ।। ५ ।।

Chapter – 12 – Shloka -6

 

Bhagwad Geeta 12-06- TheGita.net

But those who worship Me, dedicating all actions to Me, regarding Me as the Supreme Goal, meditating on Me with single-mindness.

परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्त्त जन सम्पूर्ण कर्मो को मुझ में अर्पण करके मुझ सगुण रूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्त्तियों से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं ।। ६ ।।

Chapter – 12 – Shloka -7

 

Bhagwad Geeta 12-07- TheGita.net

These worshippers’ thoughts are set on Me; hence O Arjuna, I become their saviour from the wheel of birth and death.

हे अर्जुन ! उन मुझ में चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्त्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार समुद्र से उद्बार करने वाला होता हूँ ।। ७ ।।

Chapter – 12 – Shloka -8

 

Bhagwad Geeta 12-08- TheGita.net

Therefore, fix your mind on Me alone, let your thoughts reside in Me. You will hereafter live in Me alone. Do not have any doubt about it.

मुझ में मन को लगा और मुझ में ही बुद्भि को लगा ; इसके उपरान्त तू मुझ में ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं हैं ।। ८ ।।

Chapter – 12 – Shloka -9

 

Bhagwad Geeta 12-09- TheGita.net

If you are not able to set your mind on Me, O Arjuna, then wish to reach Me by the Yoga of constant practice.

यदि तू मन को मुझ में अचल स्थापन करने के लिये समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन ! अभ्यास रूप योग के द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिये इच्छा कर ।। ९ ।।

Chapter – 12 – Shloka -10

 

Bhagwad Geeta 12-10- TheGita.net

If you are unable to perform the Yoga of constant practice, then be intent on doing your actions for My sake; thus, performing actions for My sake, you will attain perfection.

यदि तू उपर्युक्त्त अभ्यास में भी असमर्थ है तो केवल मेरे लिये कर्म करने के ही परायण हो जा । इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मो को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्भि को ही प्राप्त होगा ।। १० ।।

Chapter – 12 – Shloka -11

 

Bhagwad Geeta 12-11- TheGita.net

If you cannot do actions for My sake, then taking refuge in Me, renounce (abandon) all the fruits of action by controlling yourself.

यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है तो मनबुद्भि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मो के फल का त्याग कर ।। ११ ।।

Chapter – 12 – Shloka -12

 

Bhagwad Geeta 12-12- TheGita.net

To gain spiritual knowledge is better than to practise Yoga; Meditation is better than Knowledge, abandoning the fruit of action is better than meditation because peace immediately follows the abandoning of the fruits of action.

मर्म को न जान कर किये हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ट है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ट है और ध्यान से भी सब कर्मो के फल का त्याग श्रेष्ट है ; क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है ।। १२ ।।

Chapter – 12 – Shloka -13, 14

 

Bhagwad Geeta 12-13-14 -TheGita.net

The Lord describes the divine qualities of a devotee:
He who hates no one, who is friendly and compassionate to all, who is free of egoism, balanced in pain and pleasure and forgiving.
He who is ever content, ever steady in meditation, self-controlled and firmly committed with mind and intellect fixed on Me, that devotee is dear to Me.

जो पुरुष सब भूतों द्बेष-भाव से रहित, स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु हैं तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित सुख-दुःख़ों की प्राप्ति में सम और क्षमावान् हैं अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला हैं ; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए है और मुझ में दृढ़ निश्चय वाला हैं —- वह मुझ में अर्पण किये हुए मन-बुद्भि वाला भक्त्त मुझको प्रिय हैं ।। १३ – १४ ।।

Chapter – 12 – Shloka -15

 

Bhagwad Geeta 12-15- TheGita.net

He who does not harm anyone in the world and from whom the world is not agitated, and he who knows no joy, envy, fear and anxiety, that devotee is dear to me.

जिससे कोई भी जीव उद्बेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी उद्बेग को प्राप्त नहीं होता, तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्बेगादि से रहित हैं वह भक्त मुझ को प्रिय हैं ।। १५ ।।

Chapter – 12 – Shloka -16

 

Bhagwad Geeta 12-16- TheGita.net

He who is free from desires, who is pure, expert, unconcerned, free from pain, selfless in all of his actions, he who is thus devoted to Me, is dear to Me.

जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध, चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ हैं — वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त्त मुझको प्रिय हैं ।। १६ ।।

Chapter – 12 – Shloka -17

 

Bhagwad Geeta 12-17- TheGita.net

He who neither rejoices (obtaining the desirable objects), nor hates (the undesirable objects), nor grieves (losing his beloved objects), nor desires (his beloved objects), free from the notions of good and evil, full of devotion, he is dear to Me.

जो न कभी हर्षित होता है, न द्बेष करता हैं, न शोक करता हैं, न कामना करता हैं तथा जो शुभ और अशुभ कर्मो का संपूर्ण त्यागी हैं, वह भक्त्ति युक्त्त पुरुष मुझको प्रिय हैं ।। १७ ।।

Chapter – 12 – Shloka -18

 

Bhagwad Geeta 12-18- TheGita.net

He who is the same to enemy and friend and also in honour and dishonour, in cold and heat, in pleasure and pain, and who is free from attachment-

जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सरदी, गरमी और सुख-दुःखादि द्बन्द्बों में सम हैं और आसक्ति से रहित हैं ।। १८ ।।

Chapter – 12 – Shloka -19

 

Bhagwad Geeta 12-19- TheGita.net

He who is neutral in censure and praise, He who is silent, content with anything (in the world), does not claim any residence as his home, he who is steady-minded, full of devotion; that man is dear to Me.

जो निन्दा स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट हैं और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित हैं —–वह स्थिर बुद्भि भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय हैं ।। १९ ।।

Chapter – 12 – Shloka -20

Bhagwad Geeta 12-20- TheGita.net

They who follow this immortal law as described above, endowed with faith, looking upon Me as their supreme goal and being devoted, are extermely dear to Me.

परन्तु जो श्रद्बायुक्त्त पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्म मय अमृत को निष्काम प्रेम भाव से सेवन करते हैं, वे भक्त्त मुझको अतिशय प्रिय हैं ।। २० ।।

 

Chapter 1|| Chapter 2 || Chapter 3 || Chapter 4|| Chapter 5 || Chapter 6 || Chapter 7 || Chapter 8 || Chapter 9 || Chapter 10 || Chapter 11 || Chapter 12 || Chapter 13 || Chapter 14 || Chapter 15 || Chapter 16 || Chapter 17 || Chapter 18 ||

Be Sociable, Share!